Monday, March 14, 2011

CHASNALA

It was just another night
Full of twinkling stars
And the deep cut moon
Steadily growing bright.
Cradling their children
To happy dreams
Putting soul behind
Mothers were singing
Their favourite lullabyes,
Very close to their heart.
Old aged father was coughing out the night
In a solitary room just outside.
Restless dogs were barking loud
Thickening the darkness
Of CHASNALA.

On the fateful freezing night
Of 27th December,1975
Almost 3000 head lamps came
Out of the Old Light-House
Dazzling the dark core of the Mine
Like the fire flies
Four hundred feet below the surface.
With gillatin rods in their hands
They were measuring
The depth of the MINE,
The layers of "BLACK DIAMOND"
And the sound of horrible hollowness
On the other side of the wall.

Ignoring the experience of those
Making their presence felt
Through the impression of their thumb,
The blast was carried out-the blast of DEATH.
The River Damodar
With all fury and fire
Roared through the wall
That instantly caved in
Putting off the lamps
Atonce.
But
There were dreams
Still floating
In their open shocked eyes.

It took months
To bring Damodar out
But at a cost.
Human skeleton were still coming out
To say the story of utmost greed
And human plight.
Their songs of pleasure or pain
Sung with diffrent mood
Hangs in the air even today.

The songs of the mothers were lost,
The sound of coughing old man was gone,
The children suddenly turned young,
Flowers around lost their sheen.

The care free faces
Throwing coins on funny cock-fight
Are now rarely seen.
Temple of Mother KALI is filled
With terrible void,
Where once
Thounds used to bent
Their heads and knees
Without showing
Their caste and creed.

Though
By vacating the families
And tearing away
The pages of presence
Attempts were made
To erase
The memories of those
Brave hearts.

But
Even today
As a DATE they stay
In their family's heart,
In commons'mind.

चासनाला
(धनबाद से बीस किलोमीटर दूर एक कोयला क्षेत्र है चासनाला. २७ दिसंबर १९७५ की रात को एक विस्फोट होता है खान के ३०० फुट नीचे और ७० लाख गैलन प्रति मिनट के हिसाब से पानी घुस जाता है खादान में और करीब ३००० मजदूर कभी ऊपर नहीं आ पाते. सरकारी आकड़ों में ये केवल ३७२ हैं. यह कोई दिल्ली तो नहीं है कि मनाई जाएगी इस हादसे की बरसी या फिर से खुलेगी इसकी फ़ाइल भोपाल गैस कांड की तरह. गुमनाम चासनाला शहीदों को समर्पित यह कविता )

आम सी ही रात थी
चाँद आसमान में खिला था
तारे झिलमिल कर रहे थे
माँ लोरिया सुना कर
सुला रही थी बच्चों को
बूढ़े पिता खांस रहे थे बाहर के कमरे में
और जोर जोर से भौंक रहा था
धौरे का कुत्ता
चासनाला में
२७ दिसम्बर १९७५ की
सर्द रात को

बत्ती घर से
उठी थी लगभग ३००० बत्तियां
और झिलमिल हो उठा था
चासनाला का भूगर्भ
लगभग चार सौ फुट नीचे
टिमटिमाती बत्तियों से

हाथ में थामे
जिलेटिन का बैटन
स्टील के लम्बे छड़ों से
मापी जा रही थी
खदान की और गहराई
कोयले की परतें
खोखलेपन की आवाज़ को
और निरक्षरों के अनुभव की
अनसुनी कर
किया गया था एक विस्फोट
जो साबित हुआ अंतिम ही

एक विस्फोट और
सत्तर लाख गैलन प्रति मिनट की दर से
दामोदर के सैलाब ने
भर दिया चासनाला का गर्भ
और समाहित हो गयीं
वे तीन हज़ार बत्तियां
काले स्याह चेहरों के बीच
झिलमिलाती पुतलियाँ और
उनमे भरे सपने

महीनो लग गए
चासनाला खान से
निकालने में पानी
वर्षों तक कंकाल मिलते रहे खान से
चैता और विरहा के आलाप भी
गूंजते से सुनाई देते थे चासनाला खान में

वह जमाना नहीं था
लाइव रिपोर्टिंग का
फिर भी बिके थे
अखबार पत्रकार
अधूरी रह गईं
माँ की लोरियां
खांसते बूढ़े
गुम से हो गए
अचानक से
बड़े हो गए बच्चे
और पलाश, पुटुष, अमलताश
चुप से हो गए

मुर्गों की लड़ाई पर
पैसे फेंकते निर्द्वंद चेहरे
गायब हो गए
काली माँ का मंदिर
जहाँ रोज़ झुकाते थे
हजारों मजदूर अपना माथा
धर्म जाति से परे
खाली रहने लगा

फिर बनी
जांच समितियां
हुए धरने प्रदर्शन
हटा दिए गए रातो रात
हाजिरी रजिस्टरों के पन्ने
और खाली करा दिए गए
धौरे, मोहल्ले
और फिर
हो गया सामान्य सब कुछ
चासनाला में

बस हँस नहीं पाया
हंसोड़ बत्तीबाबू फिर कभी
२७ दिसंबर १९७५ की रात के बाद