Wednesday, September 7, 2011


After a long gap
We met again
We were destined to it.
As the very process.....
Of meeting and parting,
Parting and meeting
Was written on every wall.

When we met
We found
Our memories have taken a heavier toll
On us than our age.

Now,we weren't what we were
At the time of separation
The present was not like the past.
We were what we weren't ever.

You and I
Kept watching each-other
For long
Trying to find the second end
(With a sense of eternity,)
Perhaps we were shocked,
By the sudden burst of emotions,
And trying to make dams of lids
For our over-brimming tears.
Then at once
It flashed through my mind
We hadn't looked so intently at each-other so long
Even at the time of our first meet
I was a bit confused
As to who should we blame
Time or life?
....Our lips were tight......

There was a tree
With two red flowers on it
In the hotel ground
Sitting whereunder like before
We asked for tea.
As usual it was brought
In two white cups
Filled with colour of life.
We started making sips
And talked non-sense
To get some sense out of it,
"How are you and how is life going?" etc.
Meaningless question's
Baseless answers.
Every question had the same answer,
"All is well".

Off and on
we were looking back
As if looking for someone behind
(Though who I always wanted to see was sitting before me).
Infact, we were foolishly trying to hold
Our tars back.

After a long silence
I dared to ask,
"Do I still come in your dreams."
With a faint smile on your face
you said, "No, now not."
I didn't know
Whether it was true or false.
You asked in the same manner,
"Ever felt my absnce,
Or got busy in the world around."
"It's a matter of heart", I softly said.

I asked, "Do you remember everything ?"
You said, "yes."
You looked at me with a question in your eyes,
"And you ?"
I replied, " yes, I still remember everything"
Infact,I didn't forget anything.
Not even you. Never.
Both of us wept silently,
Tears rolled out of our eys.

Dark clouds covered the sky,
And it started drizzling.

I wanted to save you from the rain
By taking you under the shade
So, I lent my hands to you
With a glimpse of hesitation in your eyes
You gave your hand in my hand
That you left once
At an unknown turn.
Time played pranks with me,
Several times.

You were standing by my side
Rain was heavily pouring down.
I asked you, " Do you remember the rain?"
"Which one ? " you grew slightly interrogative.
I Said, " That one in the old city,dear."
You said, "We never got drenched in the rain."
With a smile on my face I said,
"Let us dance in the rain, but once."

After some time you said, " Now I'll leave"
The clock stopped ticking for me.
I saw drops of water falling
From the flowers of the tree
In the cup of tea
And the rain water filling it by and by.

I implored, " Please,don't go now."

You were mature enough
And it was impossible for you
To live in the world of love
As you never knew
How relations thrive.

You impatiently said,
" No! Not now.It's too late."
And you left.

I came out
And kept watching you go
Till you reach the turn of the road.
I was geting havily drenched ...
You turned your face,looked at me
And went away

I stood there like a statue
And kept watching my tears
Mingling with the drops of rain

When I looked back
There was none
At the end of the turn.

The petals of the flowers have fallen
The cup of tea was full of rain water,
And so was the life.

फूल,चाय और बारिश का पानी

बहुत दिनों के बाद ,
हम मिले...
हमें मिलना ही था , प्रारब्ध का लेखा ही कुछ ऐसा था .
मिलना , जुदा होना और फिर मिलना और फिर जुदा होना ......!!!

जब मिले तो देखा कि
उम्र से ज्यादा कहर ,
हम पर;
हमारी यादो ने ढाया था .
हम वो नहीं थे , जो जुदा होते वक़्त थे ..
हम वो थे, जो ,हम कभी थे ही नहीं ...

मैं तुम्हे और तुम मुझे बहुत देर तक यूँ ही देखते रहे
शायद हैरान थे और कुछ कोशिश आंसुओ को रोकने की भी थी
मुझे याद आया कि , जब हम पहली बार मिले थे ,
तब भी इतना नहीं देखा था एक दुसरे को ;
वक़्त से शिकवा करे या ज़िन्दगी से ,
कुछ समझ नहीं आ रहा था ….
……. लब खामोश थे .!!

होटल के खुले आँगन में एक पेड़ जिसमे ;
दो लाल रंग के फूल खिले थे;
उसके नीचे बैठकर, हमने चाय मंगाई .
हमेशा की तरह दो सफ़ेद कप
और उनमे ज़िन्दगी की रंग वाली चाय
हमने चाय पीना शुरू किया और
बेकार की बातो से एक दूसरे को टटोलना शुरू किया
जैसे ….कैसे हो
ज़िन्दगी कैसी है

निरर्थक से सवालों के
एक झूठा सा जवाब
सब अच्छा है ,
हर सवाल का यही जवाब था !!

हम थोड़ी थोड़ी देर में पीछे मुड जाते थे
जैसे किसी को देख रहे हो
[ जिसे उम्र भर देखना चाहा था ; वो सामने ही बैठा था ]
दरअसल ,हम अपने आंसुओ को पी जाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे.

बहुत देर की ख़ामोशी के बाद मैंने कहा
मेरी याद नहीं आती !

तुमने एक फीकी सी मुस्कराहट को ओड़ कर कहा
नहीं ; अब नहीं आती है !!
पता नहीं ये सच था या झूठ ,

तुमने पुछा ,
तुम्हे भी नहीं आती होंगी
दुनिया में मन लग जाता है
मैंने कहा
“ यहाँ बात दिल की है”

मैंने पुछा ,
तुम्हे याद है सब कुछ
तुमने कहा , हाँ
तुमने मेरी देखकर कहा
और तुम्हे ?
मैंने कहा हाँ, मुझे सबकुछ बहुत अच्छे से याद है ,
in fact , मैं तो कुछ भी नहीं भूला हूँ
तुम्हे भी नहीं ...कभी नहीं ...!!

तुम रोने लगी
और मैं भी ;

आकाश में अचानक घुमड़ घुमड़ कर बादल आ गए थे
हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी थी .

मैंने हाथ बढ़ाया तुम्हारी ओर
तुम्हे बारिश से बचाने के लिए ,
होटल के shade में ले जाना चाहता था
तुमने हिचकते हुए
मेरे हाथ में अपना हाथ दिया
उसी हाथ में ,
जिसे तुमने एक अजनबी से मोड़ पर छोड़ दिया था
समय भी कैसे कैसे पल दिखाता है हमें

तुम मेरे पास खड़ी थी
बारिश अब जोरो से होने लगी थी
मैंने तुमसे पुछा , याद है तुम्हे वो बारिश
तुमने मुस्करा कर कहा , कौनसी
मैंने कहा अरे वही उस पुराने शहर वाली बारिश
तुमने कहा कि हम कभी बारिश में भीगे ही नहीं
मैंने मुस्कराते हुए कहा , अब भीग जाए !!

तुमने कुछ देर ठहर कर कहा , मैं चलती हूँ ...

समय फिर रुक सा गया,
मैंने देखा चाय के कप में ;
पेड़ के फूलो से पानी टपक रहा था ;
और बारिश का पानी जमा हो रहा था .

मैंने कहा कि ,
नहीं .
अब मत जाओ ...

लेकिन तुमने मुझसे ज्यादा दुनिया देखी थी
मेरी प्रेम की दुनिया में तुम नहीं रह सकती थी .
क्योंकि साथ निभाना तुमने नहीं जाना था .

तुमने कहा ,
नहीं , अब बहुत देर हो चुकी है
और .......तुम चली गयी !

मैं बाहर आ कर तुम्हे मोड़ तक देखते रहा
मैं भीग रहा था जोरो से..
तुमने मुड़कर देखा मुझे मोड़ पर ;
और चली गयी .

मैं बहुत देर तक वह खड़ा रहा ,
और बारिश के पानी में ;
मेरे आंसुओ को मिलते हुए देखता रहा

मैं मुड कर देखा ,
मोड पर अब कोई नहीं था
और ;
वो दो फूल झड गए थे .
चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ;
और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!


  1. राजीव जी
    आपने बहुत अच्छा translation किया है ,. आप से निवेदन है की इसे कमेन्ट के रूप में मेरे कविता में पोस्ट करे. आपने इतना अच्छा अनुवाद किया है ,की , इसमें कोई कमी ही नहीं ,, बस वही भाव है जो मेरी कविता में थे. आपका दिल से धन्यवाद. राजीव जी . आप इसे अपने ब्लॉग पर लगाये . बहुत अच्छा रहेंगा .

  2. आपकी इस शानदार कोशिश के लिये आपका एक बार और से धन्यवाद. और दिल से बधाई !!

  3. Very nicely done...भावानुवाद..पूर्ण प्रवाह बरकरार है..बधाई.

  4. वाह! Nice selection of words to express a beautiful thought of Vijay Ji !

  5. wow... as beautiful as the Hindi version... so nice execution... fir bah gaye... n at last again thought... "y not"

  6. After reading this english version i went through the marvellous original write by Vijayji and will say you have done full justice to the work.

    It was nice to read you.



  8. You gave your hand in my hand
    That you left once
    At an unknown turn.
    Time played pranks with me,
    Several times.....

    Very appealing lines....


  9. beautifully written...
    expressions r great... ...flowing n soothing.

  10. Beautiful poem with a nice and easy flow and great selection of words. Flood of emotions captured without a camera.

  11. क्या कहूँ जो भी लिखूँगी वो कम ही होगा बस इतना ही कहूँगी कि दिल को छु गई आपकी यह रचना....आभार

  12. The target language gives the same fragrance which emnates from the source language..You deserve Kudo from my side for your unrivalled work in the field of translation .. Thanks.

  13. आपके पोस्ट पर आना सार्थक सिद्ध हुआ । पोस्ट रोचक लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । धन्यवाद ।

  14. आपके पोस्ट पर आना बहुत अच्छा लगा आपकी रचनाके लिए मेरे पास शब्द नहीं है ...बे मिशल लिखा है ..बधाई

  15. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती आप के ब्लॉग पे आने के बाद असा लग रहा है की मैं पहले क्यूँ नहीं आया पर अब मैं नियमित आता रहूँगा
    बहुत बहुत धन्यवाद् की आप मेरे ब्लॉग पे पधारे और अपने विचारो से अवगत करवाया बस इसी तरह आते रहिये इस से मुझे उर्जा मिलती रहती है और अपनी कुछ गलतियों का बी पता चलता रहता है
    दिनेश पारीक
    मेरी नई रचना

    कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: माँ की वजह से ही है आपका वजूद: